
At Lahartara Talaab, a bright white light from the sky descended on a lotus flower and took the form of a baby boy. At that time Ashtanandji (Disciple of Swami Ramanandji) was meditating near the pond.

Ashtanandji was very astonished and reported the whole incident to his Guru- Swami Ramanandji. Hearing about the incident, Swami Ramanandji said that the world will soon come to know about this baby boy and he truly became well renowned in the world by the name “Sant Samrat Satguru Kabir Sahib”
ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को सन 1398 (विक्रमी संवत 1455) को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में (जोकि सूर्योदय से लगभग डेढ़ घण्टे पहले होता है) कबीर साहिब सतलोक से आकर शिशु रूप में लहरतारा तालाब के ही कमल के पुष्प में विराजमान हुए। इस घटना के प्रत्यक्ष दृष्टा स्वामी रामानन्द जी के शिष्य ऋषि अष्टानांद जी थे जो प्रतिदिन सुबह वहाँ साधना के लिए जाते थे। उन्होंने तेज प्रकाश उतरता देखा, उस तीव्र प्रकाश से सारा लहरतारा तालाब जगमग हो उठा एवं स्वयं ऋषि अष्टानांद की आंखें चौंधिया गईं। उन्होंने वह प्रकाश एक कोने में सिमटते देखा
अष्टानंद जी को बहुत आश्चर्य हुआ और उन्होंने अपने गुरु स्वामी रामानंद जी को पूरी घटना बताई। घटना के बारे में सुनकर स्वामी रामानंद जी ने कहा कि दुनिया को जल्द ही इस बच्चे के बारे में पता चल जाएगा और वह सचमुच दुनिया में “संत सम्राट सतगुरु कबीर साहब” के नाम से प्रसिद्ध हो जाएगा।
