सुरति करो मम साइयाँ, हम हैं भवजल माहिं।
आपही हम बहा जायेंगे, जो नहिं पकरो बाहिं॥
में अपराधी जन्म का, नख शिख भरा विकार ।
तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो सम्हार ॥
मुझ में गुण एको नहीं, जान ले शिर मौर।
तेरे नाम प्रताप सौ, पाऊँं आदर ठौर॥
अवगुण मोरे बाप जी, बख्श गरीब निवाज।
जो मैं पूत कपूत हूँ, तोहि पिता की लाज॥
अवगुण किये तो बहु किये, करत ना मानी हार।
पावैं बंदा बखशिये, पावैं गर्दन मार॥
में कामी में कुटलू, में अवगुण की खान।
मौ पर कृपा न छाड़िये, दास आपनो जान ॥
सतगुरु दीन दयाल जी, तुम लग मेरी दौड़ ।
जैसे काग जहाज पर, सूझत कतहु न ठौर ॥
सुनो पुरुष मेरी विनती , साहिब दीनदयाल ।
पतित उद्धारन सांइयाँ , तुम हो नजर निहाल॥
विनती करि अस नाई सिर कहूँ करि जोरि बहोरी।
चरन सरोरूह नाथ जनि, कबहूँ तजे मत मोरि॥
क्या मुख ले विनती करूँ , लाज आवत है मोहि।
तुम देखत औगुण करूँ , कैसे भावों तोहि ॥
भक्ति दान मोहि दीजिए, गुरु देवन के देव।
और नहीं कछु चाहिए, निसदिन तेरी सेब
गुरु. केवट तुम होय, करो भवजल पारी।
जीव ब्रह्म करि देत हो, हरो व्याधा सारी ॥
सत्गुरु से माँगु यही, मोहि गरीबी देहु।
दूर बड़प्पन कीजिए, नन्हा ही करिलेहु ॥
धरनी बिलख विनती करे , सुनिय प्रभु हमार।
सब अपराध छिमा करो, मैं हूँ सरन तिहार॥
विनती लीजै मान करि, जानि दास को दास।
धरनी सरनी राखिये , अवर न दूसर आस॥
तुम तो समरथ सांइयाँ , दृढ़ि करि पकरौ बांहि।
धुरहिलै पहुँचाइ यो , जानि छोड़ो मग माहिं ॥
भक्ति मजूरी दीजिए, कीजेै भवजल पार।
बोरत है माया मुझे , गहै बॉँह बरियार ॥
नहीं विद्या नहीं बाहुबल, नहीं खरचन को दाम।
मो सम पतित पतंग की, तुम पत राखो साहिब ।।
नाथ एक वर माँगहूँ , मोहि कृपा करि देहु।
जनम जनम प्रभु पदकमल, कबहूँ घटै जनिनेहु।।
साहिब तुम जनि बीसरो , लाख लोग मिलि जाहिं।
हमसे तुमरे बहुत हैं , तुम सम हमरे नाहिं॥
तिल तिल का अपराधी तेरा, रती रती का चोर।
पल पल का मैं गुनहि तेरा, बख्शो औगुण मोर॥
आदि पुरुष कृपा करो, सब औगुण छुट जाहिं।
साध होन लच्छन मिलैं , चरन कमल की छाहिं॥
कृपा करो अनाथ पर, तुम हो दीनानाथ।
हाथ जोड़ माँगु यही, मम सिर तुम्हरे हाथ ॥
References
Book: मन पर जो सवार है ऐसा विरला कोई | Man Par Jo Savar Hai Aisa Virla Koi
Website: https://sahibbandgi.com/sahibBandgi-HindiEbooks.htm
